Ram Mandir: रामजन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र से पहले काशी में बना था रामालय ट्रस्ट, श्रीमठ में सिमटा है इतिहास - Early News 24

Ram Mandir: रामजन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र से पहले काशी में बना था रामालय ट्रस्ट, श्रीमठ में सिमटा है इतिहास

Ram Mandir: रामजन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र से पहले काशी में बना था रामालय ट्रस्ट, श्रीमठ में सिमटा है इतिहास

जाति-पाति पूछे न कोई। हरि को भजै सो हरि का होई… का संदेश पूरी दुनिया में फैलाने वाले रामानंद संप्रदाय ने कई दशक पहले अयोध्या में भव्य राम मंदिर निर्माण की पहल की थी। न्यायालय से बाहर इस मसले को हल करने के लिए रामानंद संप्रदाय के अलग-अलग प्रतिनिधियों को जोड़कर 1994 में रामालय ट्रस्ट का गठन किया गया था। काशी के पंचगंगा घाट के श्रीमठ के पीठाधीश्वर रामनरेशाचार्य को ही अयोध्या के राम मंदिर निर्माण के लिए समन्वय की जिम्मेदारी भी सौंपी गई। हालांकि तत्कालीन तंत्राचार्य स्वामी चंद्रास्वामी को ट्रस्ट में शामिल किए जाने के प्रस्ताव पर विवाद हो गया और फिर रामालय ट्रस्ट मंदिर निर्माण के अभियान को गति नहीं दे पाया।

अयोध्या में बन रहे भव्य मंदिर में रामलला की प्राण प्रतिष्ठा 22 जनवरी को होनी है। ऐसे में रामानंद संप्रदाय के प्रमुख केंद्र काशी के पंचगंगा घाट स्थित श्रीमठ की चर्चा होना लाजिमी है। यहां से ही शैव और वैष्णव के बीच चल रहे अंतरद्वंद्व को समाप्त करते हुए 12वीं सदी में रामानंदाचार्य ने संप्रदाय परंपरा का रूप दिया।

श्रीमठ से जुड़े अरुण शर्मा बताते हैं कि काशी के इस केंद्र से ही भगवान राम की भक्ति को अभियान का रूप दिया गया। तत्कालीन नरसिम्हा राव की सरकार में रामालय ट्रस्ट का गठन हुआ था और रामनरेशाचार्य को इसका समन्वयक बनाया गया था। अयोध्या का हनुमान गढ़ी और राम मंदिर रामानंद संप्रदाय का ही है।

कबीर को दिया था गंगा तट पर राम का मंत्र

काशी विश्वनाथ मंदिर के न्यासी पंडित दीपक मालवीय बताते हैं रामानंदाचार्य के काशी में प्रवास के कई प्रमाण हैं। यहां पंचगंगा घाट की सीढि़यों पर ही संत कबीर ने उनसे दीक्षा के लिए संपर्क किया। कबीर जब सीढि़यों पर लेट गए और रामानंदाचार्य जी का पांव उन पर पड़ा तो उनके मुख से राम राम निकला था। संत कबीर ने इसी को गुरु मंत्र मान लिया था।

रामानंदाचार्य जी ने काशी और अयोध्या को एक सूत्र में पिरोया
संकटमोचन मंदिर के महंत प्रो. विश्वंभर नाथ मिश्र ने बताया कि शैव और वैष्णव के बीच की खाई को पाटने के लिए रामानंदाचार्य जी ने काशी और अयोध्या को एक सूत्र में पिरोया। उन्होंने शिव के धाम से राम के नाम के मंत्र को दुनियाभर में फैलाया। उनके 12 शिष्यों ने ही अलग अलग संप्रदाय और संत परंपरा की शुरुआत की।

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