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हरियाणा के राजनीति पर भी बड़ा असर पड़ सकता है महंत बालक नाथ का बढ़ता कद

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चंडीगढ़ : मोदी लहर पर सवार भारतीय जनता पार्टी ने मध्य प्रदेश, राजस्थान जैसे बड़े राज्यों सहित छत्तीसगढ़ में हुए विधानसभा चुनाव में बंपर जीत दर्ज कर साल 2024 में होने वाले लोकसभा चुनाव में फिर से वापसी को लेकर कांग्रेस के सामने मानसिक बढ़त की बड़ी लकीर खींच दी है। जिसको लेकर कांग्रेसी रणनीतिकारों को  मोदी के करिश्माई नेतृत्व की काट के लिए नए सिरे से सोचना पड़ेगा।

वहीं उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी के बाद राजस्थान के अलवर से सांसद और हाल ही में हुए विधानसभा चुनाव में तिजारा विधानसभा से विधायक बने महंत बाबा बालक नाथ का नाम भी इन दिनों देश की राजनीति में मुख्य रूप से चर्चा में है। ऐसे में यदि भाजपा नेतृत्व में इन तीनों हिंदी भाषी राज्यों में ट्रंप कार्ड हिंदुत्व से दो कदम और आगे बढ़ते हुए बालक नाथ को राजस्थान के मुख्यमंत्री की कमान सौंप दी। एक तो उत्तर प्रदेश के बाद एक बार फिर से देश की राजनीति में आदित्य योगीनाथ के बाद एक और महंत मुख्यमंत्री के पद पर आसीन होंगे। इसके अलावा पार्टी का हार्डकोर हिंदू मतदाता पार्टी के प्रति और वफादार रहेगा। वहीं इसका हरियाणा के राजनीति पर भी बड़ा असर पड़ सकता है। जिसके चलते भाजपा एक तीर से दो शिकार करने में कामयाब हो सकती है।

अगर भारतीय जनता पार्टी द्वारा महंत बालक नाथ को राजस्थान की कमान सौंप गई तो यह हरियाणा भाजपा के लिए एक मास्टर स्ट्रोक के रूप में साबित सकता है। जिसका सबसे बड़ा प्रभाव मुख्यमंत्री भूपेंद्र हुड्डा की राजनीति सहित उनके मुख्य गढ़ रोहतक, सोनीपत, झज्जर सहित अन्य कई जिलों पर पड़ सकता है। हालांकि पिछली विधानसभा चुनाव में जहां रोहतक विधानसभा से मनीष ग्रोवर ने भारतीय जनता पार्टी के रूप में विधानसभा चुनाव जीत कर सभी को चौंका दिया था, वहीं बीते लोकसभा चुनाव में भी और रोहतक लोकसभा क्षेत्र से लगातार तीन बार के सांसद मुख्यमंत्री भूपेंद्र हुड्डा के पुत्र दीपेंद्र हुड्डा को सांसद अरविंद  शर्मा ने हराया था। इसके अलावा हुड्डा के दूसरे गढ़ सोनीपत से खुद पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र हुड्डा भी लोकसभा चुनाव हार गए थे। अगर महंत बाबा बालक नाथ को राजस्थान के मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बिठाया जाता है तो उसका सीधा असर हरियाणा के तीनों जिलों में पड़ना लाजमी है। क्योंकि वह हरियाणा के विख्यात अबोहर अस्थल मठ के संचालक हैं। जिस कारण यहां राजनीति का प्रभावित होना लाजमी है।

वहीं दूसरी ओर हरियाणवी कहावत के अनुसार जहां घर में परिवार के मुखिया के कहे अनुसार चलने वाला परिवार तरक्की करता है और घर के मुखिया की न मानने वाला परिवार हमेशा आर्थिक विकास के साथ-साथ राजनीतिक सामाजिक  रसूख  में भी कमजोर हो जाता है। इसी प्रकार से भारतीय जनता पार्टी परिवार के मुखिया मानते हुए व्यक्ति विशेष को तरजीह न देकर पार्टी और संगठन को प्रथम पंक्ति में रख राजनीति में नए आयाम गढ़ रहे हैं। वहीं दूसरी ओर हरियाणा  कांग्रेसी गुट बाजी से उबर नहीं पा रही है। जिसका असर यह है कि पिछले लंबे समय से पार्टी प्रदेश में संगठन तक नहीं खड़ा कर पाई। यही नहीं, बीते विधानसभा चुनाव में भी गुटबाजी के कारण उनके हाथ से सत्ता छिटक गई। ऐसे में सवाल उठता है कि अगर इन सब के बावजूद भी प्रदेश कांग्रेस के नेताओं ने निजी हितों को त्याग कर पार्टी हित के बारे में नहीं सोचा तो कहीं ऐसा ना हो कि आने वाले विधानसभा चुनाव में भी एक बार फिर से भाजपा बाजी मारते हुए जीत की हैट्रिक ना लगा दे। क्योंकि जिस प्रकार से तीनों राज्यों के विश्लेषण के बाद सामने आया है कि कांग्रेस आला कमान की अनदेखी करते हुए वहां के स्थानीय नेताओं द्वारा खुद को ज्यादा मजबूत बताते हुए प्रदेश ही नहीं आने वाले लोकसभा चुनाव में देश की सत्ता में आने की भूमिका बनाने का मुख्य मौका गवा दिया है। जबकि इससे इधर भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय नेतृत्व ने राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे, मध्य प्रदेश के मौजूदा मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री रमन सिंह को सीधा-सीधा संदेश दिया की पार्टी पहले व्यक्ति विशेष बाद में वही राष्ट्रीय स्तर के बड़े नेताओं को भी विधानसभा चुनाव में उतरकर  कार्यकर्ता में अलग ऊर्जा भरने का कार्य किया गया।

प्रदेश कांग्रेस में बढ़ती धड़े बंदी के कारण की राजनीति के बड़े चेहरे भारतीय जनता पार्टी में मौजूद केंद्रीय मंत्री राव  इंद्रजीत सिंह, पूर्व केंद्रीय मंत्री बीरेंद्र सिंह पूर्व प्रदेश अध्यक्ष व राष्ट्रीय राजनीति में बड़ा दलित चेहरा अशोक तंवर, उत्तर हरियाणा के दिग्गज नेता पूर्व मंत्री निर्मल सिंह के अलावा हाल ही में पूर्व मुख्यमंत्री भजनलाल के पुत्र और हिसार लोकसभा से पूर्व सांसद पूर्व विधायक और प्रदेश के बड़े नॉन जाट चेहरे के रूप में जाने जाने वाले कुलदीप बिश्नोई भी पार्टी छोड़ चुके हैं। इन चेहरों के चलते जहां भाजपा मजबूत हुई है। वहीं कांग्रेस लगातार कमजोर होती जा रही है और आला कमान इन सब नेताओं को मनाने में भी असफल रहा है।

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